शून्य ही शून्य
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
संकट में हूँ, सहा नहीं जाता, प्रिया पत्नी का यूँ चल बसना।
सेवाभावी, त्यागमयी, मेरी जीवनसंगिनी, मेरी शक्ति, मेरी प्रेरणा, हर पल की मेरी सहचरी।
शून्य ही शून्य, सर्वत्र शून्य, इस संसार में अब कुछ भी अपना-सा नहीं।
न अब प्रोत्साहन, न वह अपनापन, ईश्वर निर्दयी हैं या मैं ही अभागा हूँ?
जीना पड़ रहा है उनके अभाव में। खा रहा हूँ, सो रहा हूँ, पर न चैन है, न संतोष, न हर्षोल्लास।
मन, तन, धन, सब कुछ होते हुए भी, जीवन सूना-सूना है। जीवित हूँ, मगर मन एक जीवित शव-सा है।
क्या करूँ? किससे कहूँ? कोई बहाना नहीं, कोई समाधान नहीं।
अब तो जीवन भी एक यज्ञ बन गया है, विरह की आहुति देकर जीवन जीना पड़ रहा है।
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