Thursday, June 9, 2016

सहज ग्ञान

कल्पना के घोडे दौडाने पर भी,
करुणामय  ईश्वर का बिन कृपा के
रस भरे रास भरे अर्थ भरे
अलंकार भरे  शब्द उतरना
उन का  ही  वरदान।
   हर कोई अपनी चाहों को

उन्हीं की कृपा से कर्ता पर
सोचता  है अपना बुद्धिबल।
वास्तव  में  सहज क्रिया से
बनता है  श्रेष्ठ। 
प्रयत्न की सफलता  ।
प्रयत्न -परिश्रम  में उनका ही साथ है।
मन -तन-धन की स्वस्थता  
  सर्वेश्वर की देन -मान!
मैं अध्यापक मैरी वैयाकरण की पढाई
चाहते हैं छात्र। पर कविता कितना ही प्रयत्न
न सुरीली आवाद।  न रस - न मोहक।
राग हो जाता बेराग।
पढता तो पद्य बन जाता गद्य ।
प्रयत्न में सफलता है हद तक।
सहज ग्ञान प्राकृतिक।
प्रयत्न ग्ञान बनाव शृंगार ।

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