Friday, February 16, 2018

भक्ति

 मेरी रचना पर कमंट:-


ईश्वरीय सत्ता पर विचारती एक भक्त की सारगर्भित रचना
भक्ति से शुभरंभ कर भ्रष्टाचार तक का सफर करती रचना .


प्रातः कालीन प्रणाम .
प्रार्थना में है बल.
ईश्वर है कि नहीं
सवाल है ही नहीं.
शक जनता में ,
जग में ठग ही अधिक धनी ;
सजा से बचकर ,
न्याय को अपने हाथ में लेकर
चलते फिरते हैं .
तब भगवान क्यों
तमाशा देखते रहते हैं.
सत्यवान दुखी .
असत्य अत्याचारी सुखी .
शक जनता में
जग में भगवान
है कि नहीं.

असुरों के अत्याचार ,
देवी-देवता खुद भयभीत.
ऐसे वरदानी असुरों की
शक्ति शाली असुरों की
भगवान ने की है सृष्टि .
पर खुद अवतार लेकर ही
वध किया उनसे लड़कर.
ऐसे अत्याचारों को मनमाना वर
क्यों दिया ,पता नहीं ,
जग में भगवान हैकि नहीं.
बुढापा ,रोग ,मृत्यु ,दुर्घटना
प्राकृतिक कोप , न सुधरा भ्रष्टाचारी
अब सोचो ,विचारों ,समझो
ईश्वर है कि नहीं ,
सवाल है ही नहीं.

— thinking about all the good times.
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