Saturday, July 6, 2013

आस्तिक या नास्तिक

सुना, जाना, समझा,
जो मिन्नतें करते रहते हैं ,
उनके लिये काशाय और कमंडल;
तरु तले रहते हैं,अनासक्त जीवन जीते हैं;
वह है निष्काम भक्ति;
जो कुछ मांगते हैं ,
तब भक्ति सकाम हो जाती है;
अब आप कहिये -आप नास्तिक या आस्तिक.
आगे मंदिर में हीरा,चाँदी,सोना ,रुपये के बंडल
भरा पड़ा है ,क्या आपने कुछ चढ़ाया हैं;
क्या आप ने भक्ति के नाम ,
सोने का घड़ा,हीरे का किरीट बनाया हैं? या बनवाया है;
ए सब जो करते हैं वे हैं शासक.
ए बाह्याडंबर की भक्ति का आधार अर्थ.(धन)
तब सच्ची भक्ति अर्थहीन हो जाता है;
निष्काम भक्ति तो कौपीन धारण कर बैठना;
महावीर ने तो वह भी त्याग दिया;
आज़ कल के आश्रम कितना आडंबर,
वहां के बिस्तर का दाम चन्द लाख;चंदा दिये हैं श्रन्धालुओं ने;
खासकर राजनैतिक नेता से सम्बंधित;
करोड़ों क्या,रुपये गिनने में आय कर अधिकारी थक जाते हैं;
उत्तरखण्ड के सन्यासियों के यहाँ करोड़ों रुपये थे; वे वहाँ से हिलने नहीं तैयार;
बोलिये साहब आप आस्तिक हैं या नास्तिक;
क्या आपकी माँग क्या मामूली हैं ,
जिन्होने सोने के मंदिर बनवाये,सोने की मूर्तियाँ बनवाई;
अपने काले धन के बंडल डाले;
उनके विरुद्ध मांग; वे करते हैं हवन;
वे करते हैं प्रायश्चित ;रेशम की साडियाँ जलाते हैं;
बोलिये भक्त आजकल के हैं कैसे?
क्या आप भले ही आस्तिक हो या नास्तिक
रुपये बन-बनाते हैं सब कुछ; ज़रा सोचिये कभी शासक कभी पूजा की हैं;

उनके पैसे लेकर पूजा-यज्ञ करने वाले सच्चे वेदों के पण्डित;
वे चारों वेदों को एक भ्रष्टाचारी मंत्री को बचाने करते हैं प्रार्थना;
क्या ईश्वर आपकी मांग पूरी करेगा?या वेदाध्ययन के पण्डित के हवन-पूजा पाठ का. अब बोलिये,आप आस्तिक या नास्तिक; आपकी भक्ति सकाम है या निष्काम. 
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