Wednesday, March 7, 2012

holisansaar me

संसार में आसुरी शक्तियां  अति तीव्रता से बढती हैं. ईश्वर भक्त को कई प्रकार के कष्ट को सामना करना पड़ता है.जो संसार के आधुनिक सुख -सुविधाएं और आर्थिक इच्छाओं से अपने मन को दूर रखता है,वह शांत जीवन बिता सकता है.लेकिन आधुनिक साधू संत और मठाती पति  करोड़ों के अति पति बनकर लोगों में अर्थ को प्राथमिकता देने के विचार  उत्पन्न कर रहे हैं.आध्यात्म विचार अर्थ को प्रधानता देकर मनुष्य में अलौकिकता बढाने के बदले लौकिक मोह बढ़ा रहे हैं.देव दर्शन के लिए रुपयों को प्रधान देना पाप कार्य करके प्रायश्चित को प्रोत्साहन देना धन लूटना है.पापियों को जितना ही प्रायश्चित करें,होम-यज्ञ करें  ईश्वर दंड देगा ही.पैसे के बल पर,अधिकार के बल पर ईश्वर का अनुग्रह मिलना और पाप पुण्य में बदलना असंभव है.


हिरण्य कश्यप अपने अहंकार के कारण अपने भक्त बेटे को ही ह्त्या करने के प्रयत्न में लगा.वह अपने हर प्रयत्न में हारता रहा.ईश्वर से प्राप्त वर,रजा के पद, सैनिक बल ,आर्थिक बल ,शारीरिक बल आदि से कोई मनचाहा परिणाम नहीं  मिला. पापी को दंड मिलता ही है.
होलिका  जली .पहलाद बच गया.

आप के मन में यह विचार उठेगा ही  कि पापियों की शक्ति क्यों आरम्भ से अंत तक बनी रहती है.हर कहानी में ऐसा ही दिखाया जाता है.खल नायक के कारण कथा नायक कष्टों को सहता रहता है. पर वास्तविक जीवन में पापियों के मन में शांति कभी नहीं रहती. हिरण्य  के जीवन में  उसकी अपनी मनोकामना उसके ही पुत्र के कारण
पूरी नहीं हुई. इसी चिंता से वह दुसरे कामों में नहीं लगा.उसका अंत अपनी अधूरी इच्छा के साथ हुई.

पापी अंत तक दुखी रहता है. पर पुण्यात्मा अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त करता है.यही ईश्वरीय कार्य है.हमेशा 
पुण्यात्मा के साथ ईश्वर रहता है.ईस्वर की कृप्पा कटाक्ष 
के लिए सच्ची एकाग्र भक्ति पर्याप्त है.अतः धन के पीछे मत जायिये.
पूजा और पुजापा केवल नाम स्मरण है.बाकी सब बाह्य-आडम्बर है. केवल अपने इष्ट ईस्वर पर ध्यान रखिये.
मन चंगा  तो कटौती में गंगा.रैदास केवल अपने काम में मग्न था.गंगा के किनारे पर बैठकर गंगा नदी में स्नान नहीं किया.पर उनकी एस्स्वरीय शक्ति जग विदित है.
भक्त त्यागराज केवल अपनी संपत्ति के रूप में पूजा 
सामग्री मात्र ले ली.उसका नाम सब लेते है.तुकाराम,संत एकनाथ ,कबीर,तुलसी,ईसा मसीह ,नबी सब के सब केवल ईश्वर के नाम लेकर अमर बन गए. युग-युगांतर 
तक शान्ति के मार्गदर्शक रहेंगे ही.
अत्याचारी  हमेशा निंदनीय रहेगा.
आर्थिक मोह के बिना गरीबी की दशा में ही जो धर्माचारी थे,वे ही वन्दनीय हैं.


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